Social Issues 07 Jun 2026

नकद, IVF और आवास प्रोत्साहन गिरती जन्म दर बढ़ाने में क्यों नाकाम हो रहे हैं

जन्म दर बढ़ाने के लिए दुनिया भर में नकद राशि, IVF सहायता और परिवार आवास योजनाओं का इस्तेमाल हो रहा है, और मई 2026 में आंध्र प्रदेश भी इसमें शामिल हो गया। भारत की प्रजनन दर करीब 2020 में 2.1 के replacement स्तर से नीचे गिर गई, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ पैसा एक गहरे सांस्कृतिक बदलाव को नहीं पलट सकता, जो भारत के demographic dividend और बूढ़ी होती आबादी की योजना के लिए अहम सवाल खड़े करता है।

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दुनिया भर की सरकारें अब लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए पैसे देने की कोशिश कर रही हैं। इसके तरीकों में तीसरा बच्चा होने पर दंपतियों को एक बार दी जाने वाली नकद राशि, पहली बार माता-पिता बनने वालों के लिए सरकारी खर्च पर IVF (in-vitro fertilisation, यानी एक चिकित्सा उपचार जो लोगों को गर्भधारण में मदद करता है) के अतिरिक्त चक्र, और बच्चों का पालन-पोषण कर रहे परिवारों के लिए सरकारी आवास इकाइयाँ आरक्षित करना शामिल हैं। मई 2026 में, आंध्र प्रदेश दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर पैसे देने वाले पहले भारतीय राज्यों में से एक बन गया। स्वीडन और जापान जैसे देशों ने भी इसी समस्या यानी सिकुड़ती और बूढ़ी होती आबादी से निपटने के लिए अपने उपाय शुरू किए हैं।

यहाँ मुख्य पैमाना है Total Fertility Rate (TFR), यानी एक महिला के जीवनकाल में औसतन कितने बच्चे होने की उम्मीद की जाती है। 2.1 का TFR, जिसे "replacement rate" कहा जाता है, आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए ही जरूरी होता है, क्योंकि दो बच्चे दोनों माता-पिता की जगह ले लेते हैं। 2023 तक, दुनिया के दो-तिहाई से ज्यादा लोग ऐसी जगहों पर रहते थे जहाँ TFR 2.1 से नीचे गिर चुका था। वैश्विक औसत 1960 के दशक की शुरुआत में करीब 5.3 से घटकर 2024 में 2.2 रह गया। इसी अवधि में भारत का TFR 5.9 से घटकर 2 हो गया, यानी replacement स्तर से थोड़ा नीचे चला गया। यह एक ऐसे देश के लिए बड़ा बदलाव है जहाँ कुछ ही पीढ़ियों पहले आबादी का "विस्फोट" सबसे बड़ी समस्या माना जाता था और परिवार नियोजन अभियान प्राथमिकता हुआ करते थे। खास बात यह है कि भारत करीब 2020 में replacement से नीचे की प्रजनन दर पर पहुँच गया, जो United Nations के अनुमानों से लगभग एक दशक पहले था।

प्रजनन दर इतनी तेजी से क्यों गिर रही है? बढ़ती आय, शहरीकरण और शहरी जीवन का ऊँचा खर्च, ये सब इसमें भूमिका निभाते हैं। साथ ही महिलाओं की प्रगति भी, जैसे बेहतर शिक्षा, प्रजनन से जुड़े फैसलों में ज्यादा अधिकार, और (कुछ समाजों में) घर के बाहर ज्यादा काम। जनसांख्यिकी विशेषज्ञ बताते हैं कि कई देशों में आय और परिवार के आकार के बीच का रिश्ता तक उलट गया है, जहाँ कुछ संपन्न पूर्वी एशियाई समाजों में अमीर परिवार अब कम नहीं बल्कि ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं। भारत में दशकों तक चले परिवार नियोजन के संदेश और माँ व बच्चे के स्वास्थ्य में हुई बड़ी प्रगति भी मायने रखती है। जैसे-जैसे पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर घटती है, माता-पिता को यह जरूरत महसूस नहीं होती कि कुछ बच्चों के जीवित रहने को सुनिश्चित करने के लिए कई बच्चे पैदा किए जाएँ, इस विचार को अक्सर "development is the best contraception" यानी विकास ही सबसे अच्छा गर्भनिरोधक है, के रूप में कहा जाता है।

लेकिन सिर्फ पैसा और कल्याणकारी योजनाएँ इस रुझान को पलटती नहीं दिखतीं। स्वीडन जैसे अमीर नॉर्डिक देश, जहाँ माता-पिता को उदार सहायता मिलती है और घर के काम का बँटवारा ज्यादा बराबरी से होता है, वे भी replacement स्तर से काफी नीचे हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि करीब 2010 के बाद से एक व्यापक सांस्कृतिक बदलाव, जहाँ लोग बच्चे पैदा करने को कम प्राथमिकता देने लगे हैं, इसका बड़ा कारण है। अन्य संभावित कारणों में देर से या कम शादियाँ, ज्यादा अकेले रहना, ज्यादा स्क्रीन टाइम और कम आमने-सामने की बातचीत, और भविष्य की चिंता शामिल हैं। इसके नतीजे असली हैं, जहाँ TFR 1 के आसपास या उससे नीचे गिर जाता है, वहाँ पेंशन और बुजुर्गों की स्वास्थ्य सेवा के खर्च के लिए काम करने की उम्र के पर्याप्त वयस्क नहीं बचते, जिससे टैक्स का बोझ बढ़ जाता है। मजदूरों की कमी के लिए एक सुझाया गया हल है आव्रजन (immigration), लेकिन कई जगहों पर इसने राजनीतिक विरोध को जन्म दिया है।

परीक्षा की तैयारी के लिए, यह भारत के demographic transition और जनसंख्या नीति पर बेहद जरूरी सामग्री है, जो UPSC और State PCS में अक्सर पूछी जाती है। demographic transition theory (जैसे-जैसे समाज विकसित होता है, जन्म और मृत्यु दोनों दर गिरती हैं) को याद रखें, replacement-rate का आँकड़ा 2.1, भारत का TFR करीब 2 जो लगभग 2020 में पहुँचा, और इससे खुलने वाली नीतिगत बहस को भी। भारत के पास अब भी युवा आबादी और "population momentum" है, जो उसे demographic dividend की एक खिड़की देता है, लेकिन इस खिड़की का इस्तेमाल करने के लिए उसे रोजगार, कौशल और बढ़ते स्वास्थ्य खर्च में निवेश करना होगा (केरल पहले से ही बूढ़ी होती आबादी के लिए योजना बना रहा है)। दक्षिण भारतीय राज्यों का कम TFR राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे delimitation और प्रतिनिधित्व से भी जुड़ता है, जो mains के जवाबों के लिए polity-economy का एक अहम मेल है।

याद रखने योग्य मुख्य बिंदु

  • Total Fertility Rate (TFR) एक महिला के औसतन बच्चों की संख्या है; आबादी स्थिर रखने के लिए 2.1 का "replacement rate" जरूरी होता है।
  • भारत का TFR 5.9 (1960 के दशक की शुरुआत) से घटकर 2024 में करीब 2 रह गया, और करीब 2020 में replacement से नीचे चला गया — UN के अनुमानों से पहले।
  • वैश्विक औसत TFR करीब 5.3 (1960 के दशक की शुरुआत) से घटकर 2024 में 2.2 रह गया; 2023 तक दुनिया के दो-तिहाई से ज्यादा लोग 2.1 से नीचे रहते थे।
  • मई 2026 में आंध्र प्रदेश दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर नकद देने वाले पहले भारतीय राज्यों में से एक बन गया।
  • Demographic transition theory: जैसे-जैसे समाज विकसित होता है, जन्म और मृत्यु दोनों दर गिरती हैं, जिसे अक्सर "development is the best contraception" कहा जाता है।
  • बहुत कम TFR (1 के आसपास या नीचे, जैसे दक्षिण कोरिया) पेंशन और बुजुर्गों की स्वास्थ्य सेवा पर दबाव डालता है; भारत अब भी population momentum और demographic dividend की खिड़की का फायदा उठा रहा है।

परीक्षा प्रासंगिकता

UPSC और State PCS (तथा SSC/Banking GK) के लिए सीधे प्रासंगिक, जिसमें भारत का demographic transition, total fertility rate, demographic dividend, जनसंख्या नीति और delimitation की बहस शामिल हैं।

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