Environment 21 Jun 2026

वैश्विक विद्युतीकरण की दिशा में कदम: Turkey का COP31 प्रस्ताव और भारत की ऊर्जा परिवर्तन की चुनौती

Turkey ने Bonn की मध्य-वर्षीय जलवायु वार्ता में प्रस्ताव रखा है कि देश 2035 तक कुल अंतिम ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत तक लाएं। वर्तमान में वैश्विक ऊर्जा का केवल 21 प्रतिशत बिजली के रूप में उपभोग होता है और कुल उपयोग होने वाली ऊर्जा का मात्र 8 से 9 प्रतिशत ही वास्तव में स्वच्छ है, जो ऊर्जा परिवर्तन की विशाल चुनौती को दर्शाता है।

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Bonn, Germany में आयोजित मध्य-वर्षीय जलवायु वार्ता हाल ही में बिना किसी बड़ी सफलता के समाप्त हुई, लेकिन Turkey की ओर से एक उल्लेखनीय प्रस्ताव सामने आया। आगामी COP31 जलवायु सम्मेलन के मेज़बान के रूप में, Turkey ने Antalya में प्रस्ताव रखा है कि देश 2035 तक अपनी कुल अंतिम ऊर्जा खपत (total final energy consumption) का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा बिजली से पूरा करें। वर्तमान में वैश्विक अंतिम ऊर्जा का केवल लगभग 20 से 21 प्रतिशत ही बिजली के रूप में उपभोग होता है, जिससे यह प्रस्ताव कार्बन उत्सर्जन में कमी (decarbonisation) की दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है, इसे समझने के लिए जीवाश्म ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के बीच के अंतर को जानना आवश्यक है। कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन सीधे जलाकर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। परंतु सौर और पवन जैसे नवीकरणीय स्रोतों को पहले बिजली में परिवर्तित करना पड़ता है। इसका अर्थ है कि जीवाश्म ईंधन से दूर होने की वैश्विक प्रक्रिया मौलिक रूप से हर अंतिम उपयोग क्षेत्र — परिवहन, उद्योग, ताप और अन्य — के विद्युतीकरण पर निर्भर है। व्यापक विद्युतीकरण के बिना, स्वच्छ ऊर्जा स्रोत बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन की जगह नहीं ले सकते।

आंकड़े इस चुनौती की विशालता को स्पष्ट करते हैं। 2025 तक, बिजली वैश्विक कुल अंतिम ऊर्जा खपत का लगभग 21 प्रतिशत है। उस बिजली का केवल लगभग 42 प्रतिशत ही नवीकरणीय ऊर्जा, जल-विद्युत और परमाणु जैसे स्वच्छ स्रोतों से आता है। कुल मिलाकर, आज वैश्विक स्तर पर उपयोग होने वाली ऊर्जा का मात्र 8 से 9 प्रतिशत ही वास्तव में स्वच्छ है। तीन दशकों की जलवायु कार्रवाई, नीतिगत प्रोत्साहन और तकनीकी प्रगति के बावजूद, 90 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा अभी भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। भारत में, अंतिम ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी लगभग 23 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत से थोड़ी अधिक है।

शिपिंग, विमानन, लंबी दूरी का माल परिवहन और इस्पात, सीमेंट तथा काँच निर्माण जैसी उच्च-तापमान औद्योगिक प्रक्रियाएं विद्युतीकरण के लिए अत्यंत कठिन हैं। ये hard-to-abate क्षेत्र जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बने हुए हैं और ऊर्जा परिवर्तन में एक बड़ी बाधा हैं। International Energy Agency (IEA) का अनुमान है कि तेज नवीकरणीय ऊर्जा विकास के बावजूद, 2030 तक वैश्विक अंतिम ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी केवल लगभग 24 प्रतिशत तक पहुंचेगी — जो Turkey के 2035 के 35 प्रतिशत लक्ष्य से काफी कम है।

भारतीय परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए, यह विषय कई प्रमुख पहलुओं को जोड़ता है। Paris Agreement की 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा, COP28 की 2030 तक नवीकरणीय क्षमता तीन गुना करने की प्रतिबद्धता और IRENA का वार्षिक बिजली प्रणाली निवेश में $1.2 ट्रिलियन का रोडमैप — ये सभी एक बड़े वैश्विक ढांचे का हिस्सा हैं। एक प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में भारत इन चर्चाओं में केंद्रीय भूमिका निभाता है — ऊर्जा पहुंच की जरूरतों और उत्सर्जन कटौती की प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाते हुए। कुल अंतिम ऊर्जा खपत (TFEC), प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति और अंतिम खपत के बीच का अंतर, और hard-to-abate क्षेत्रों की अवधारणा — ये सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाने वाले विषय हैं।

याद रखने योग्य मुख्य बिंदु

  • Turkey, COP31 (Antalya, November 2026, Australia के साथ सह-आयोजन) का मेज़बान, ने 2035 तक अंतिम ऊर्जा खपत में 33% बिजली हिस्सेदारी का वैश्विक लक्ष्य प्रस्तावित किया
  • 2025 तक, बिजली वैश्विक कुल अंतिम ऊर्जा खपत (TFEC) का केवल ~21% है; भारत का आंकड़ा ~23% है
  • वर्तमान वैश्विक बिजली उत्पादन का केवल ~42% ही स्वच्छ स्रोतों (नवीकरणीय, जल-विद्युत, परमाणु) से आता है
  • संयुक्त प्रभाव: कुल वैश्विक ऊर्जा उपयोग का मात्र ~8-9% ही स्वच्छ ऊर्जा है — 90% से अधिक अभी भी जीवाश्म ईंधन आधारित है
  • IRENA का अनुमान है कि 2035 तक 35% विद्युतीकरण लक्ष्य पाने के लिए बिजली प्रणालियों में $1.2 ट्रिलियन का वार्षिक निवेश आवश्यक है
  • Hard-to-abate क्षेत्र (विमानन, शिपिंग, इस्पात, सीमेंट, काँच) पूर्ण विद्युतीकरण में प्रमुख बाधा बने हुए हैं

परीक्षा प्रासंगिकता

UPSC (GS Paper 3 — पर्यावरण, ऊर्जा), State PCS और SSC CGL सामान्य जागरूकता के लिए प्रासंगिक; जलवायु वार्ता, ऊर्जा परिवर्तन, COP प्रक्रिया, Paris Agreement और IEA व IRENA जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को कवर करता है।

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